अविमुक्तेश्वरानंद: जिसको हरा नहीं सकती सरकार, उसका चरित्र हनन करती है

वर्तमान समय में हम एक ऐसी राजनीति देख रहे हैं जहाँ सत्य बोलने वालों को तथ्यों से हराना जब असंभव हो जाता है, तो उनके व्यक्तित्व पर कीचड़ उछाला जाता है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी आज इसी राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार हो रहे हैं। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह है कि उन्होंने धर्म को राजनीति की दासी बनाने से इनकार कर दिया।
एक निर्भीक संत की छवि
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी केवल एक धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि सनातन की वह मुखर आवाज़ हैं जो सत्ता की आँखों में आँखें डालकर प्रश्न पूछने का साहस रखती हैं। चाहे गंगा की निर्मलता का प्रश्न हो या मंदिरों की शास्त्रीय मर्यादा का, उन्होंने कभी भी किसी सरकार की चाटुकारिता नहीं की। जब कोई व्यक्ति बिकता नहीं और झुकता नहीं, तब सत्ता के पास केवल एक ही मार्ग बचता है—चरित्र हनन।
गंगा के लिए संघर्ष: उत्तराखंड का वह ऐतिहासिक प्रसंग
उनकी अटूट निष्ठा का सबसे बड़ा प्रमाण उत्तराखंड में देखने को मिला था। नमामि गंगे और गंगा पर बन रहे बांधों (Dams) को लेकर उनका दृष्टिकोण सदैव स्पष्ट रहा है।
एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण करना यहाँ आवश्यक है जब उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार थी। स्वामी जी के गुरु, ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी, गंगा की रक्षा के लिए अनशन पर थे। उस समय के मुख्यमंत्री जब उनसे मिलने आए, तो अविमुक्तेश्वरानंद जी का रौद्र रूप देखने लायक था।
“उन्होंने मुख्यमंत्री के सम्मुख सीधे शब्दों में कहा था कि यदि गंगा की अविरल धारा के साथ खिलवाड़ बंद नहीं हुआ, तो वे अपने प्राण त्याग देंगे, परंतु नियमों और मर्यादाओं से समझौता नहीं करेंगे।”
उन्होंने भरी सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि राजनीति धर्म के अधीन है, धर्म राजनीति के अधीन नहीं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वे गंगा के अस्तित्व के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने को तत्पर हैं।
पद का विवाद या साहस का सम्मान?
आज कुछ लोग उनके पट्टाभिषेक या पद को लेकर विवाद खड़ा कर रहे हैं। यदि एक क्षण के लिए हम यह मान भी लें कि उनके पद को लेकर कोई तकनीकी विवाद है, तो भी क्या इस तथ्य को नकारा जा सकता है कि आज के युग में उनके जैसा निर्भीक संत मिलना दुर्लभ है?
आज चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर हमें ऐसे संतों की बाढ़ दिखाई देती है जो केवल सत्ता की ‘हाँ में हाँ’ मिलाना जानते हैं। कई बड़े संत व्यक्तिगत चर्चाओं में तो सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर मौन साध लेते हैं। उनका तर्क होता है कि “जिसकी सरकार है, उसके विरुद्ध बोलना आत्मघाती है” या “विरोध करने पर आश्रमों, मंदिरों और आयोजनों में शासन-प्रशासन की बाधाएं आएंगी।”
ऐसे कायरतापूर्ण माहौल में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद एक अपवाद हैं। वे उन संतों में से नहीं हैं जो राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का सौदा करें या दंडात्मक कार्रवाई के भय से सत्य को दबा दें। सनातन धर्म को आज ऐसे ही योद्धा संतों की आवश्यकता है जो शासक के सामने खड़े होकर धर्म का पक्ष रख सकें, न कि शासक के पीछे चलकर धर्म को राजनीति का पिछलग्गू बना दें।
निष्कर्ष
शंकराचार्य एक पद नहीं, एक अक्षुण्ण परंपरा है। उन पर किए जा रहे हमले वास्तव में सनातन की स्वतंत्र और निष्पक्ष वाणी पर हमले हैं। सरकारों को यह समझना होगा कि सत्ताएँ आती-जाती रहती हैं, किंतु गुरु का स्थान और सत्य की प्रतिष्ठा अचल रहती है। जो संत गंगा और धर्म के लिए स्वयं को होम करने को तैयार हो, उसे किसी राजनीतिक प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।
